ठीक 15 दिन पहले वडोदरा में एक समारोह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, 'क्या हो अगर काले धन के खिलाफ भी एक सर्जिकल स्ट्राइक हो जाए।' तब किसी को उनकी मंशा का पता नहीं चल पाया था। लेकिन मंगलवार को रात आठ बजे जब प्रधानमंत्री ने अचानक ही राष्ट्र को संबोधित करते हुए आधी रात से देश में 500 और 1000 रुपये के नोटों को खत्म करने का एलान किया, तब उनकी बात की गहराई का पता चला।

काले धन और भ्रष्टाचार को प्रमुख चुनावी मुद्दा बना कर सत्ता में आई राजग सरकार की तरफ उठाए गए इस कदम को आजादी के बाद देश में भ्रष्टाचार व काले धन के खात्मे के लिए उठाया गया सबसे अहम कदम बताया जा रहा है।मोदी ने इस बारे में घोषणा करते हुए कहा कि अब पांच सौ और एक हजार रुपये के नोट सिर्फ कागज के टुकड़े हैं। अब देश में सिर्फ 100 रुपये, 50 रुपये, 20 रुपये, 10 रुपये, पांच रुपये, दो रुपये के नोटों के अलावा इनसे कम कीमत वाले सिक्के प्रचलन में रहेंगे।

वैसे, सरकार नए 500 और 2000 रुपये के नोट बाजार में उतारने की तैयारी कर चुकी है। नई व्यवस्था के तहत तैयारियों के लिए बैंकों को बुधवार (09 नवंबर) को बंद करने का फैसला किया गया है, जबकि बुधवार और गुरुवार (9-10 नवंबर को देश के एटीएम भी बंद रहेंगे। इसके बाद एटीएम को खुलेंगे, लेकिन जनता को सिर्फ चार हजार रुपये तक ही निकालने की छूट होगी।मोदी ने इस कदम से आम जनता को होने वाली समस्या और अफरातफरी से बचने के लिए कई कदमों का एलान किया। सबसे पहले तो जिन लोगों के पास अभी 500 और एक हजार रुपये के नोट हैं, उन्हें इसे बदलने का मौका दिया गया है। 10 नवंबर से 30 दिसंबर तक इन पुराने नोटों को बैंकों या डाकघरों में जमा कराने का मौका मिलेगा। ये नोट ग्राहक अपने खाते में जमा करा सकते हैं। शुरुआत में ग्राहकों को एटीएम से रोजाना सिर्फ दो हजार रुपये निकालने की छूट होगी। कुछ दिनों बाद इसे बढ़ाकर चार हजार रुपये किया जाएगा। बाद में इस सीमा को और बढ़ाया जा सकता है। यही नहीं, बैंक खाते से भी ग्राहकों को एक दिन में 10 हजार रुपये और 20 हजार रुपये प्रति सप्ताह निकालने की ही छूट होगी। इस सीमा को भी बाद में संशोधित किया जाएगा।

प्रधानमंत्री ने 40 मिनट के राष्ट्र के नाम संबोधन में इस कदम को देश में काले धन के खात्मे के साथ ही भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए भी बेहद जरूरी बताया। उन्होंने देश की जनता से आह्वान किया कि यह राष्ट्र निर्माण का मौका है। हम सभी को इसमें हिस्सा लेना चाहिए। बड़े नोटों के होने का फायदा आतंकी समूह भी उठा रहे थे। देश के दुश्मन भी नकली नोट छापकर भारतीय अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे थे। जनता के साथ ही पीएम ने देश के सभी राजनीतिक दलों, समाजिक संगठनों व मीडिया से इस कदम को सफल बनाने में मदद की अपील की।

सरकारी अस्पतालों में भुगतान के लिए, दवा खरीदने के लिए अभी पुराने नोट स्वीकार्य होंगे। हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशन पर भी इसे स्वीकार किया जाएगा। सरकार के इस कदम को सफल बनाने के लिए वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक में कंट्रोल रूम भी बनाया गया है। आर्थिक मामलों के सचिव शक्तिकांत दास ने बताया कि 10 नवंबर के बाद से ही नए सीरीज के नोट जारी होने लगेंगे। नए नोट महात्मा गांधी न्यू सीरिज नोट के तहत जारी होंगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले हफ्ते अपने सीनियर सचिवों के साथ टैक्स सिस्टम में बदलाव संबंधी एक प्रेजेंटेशन देखा। प्रेजेंटेशन आय कर और अन्य 30 टैक्स को खत्म करने के विषय पर थी। पुणे की आर्थिक रिसर्च कंपनी अर्थक्रांति ने प्रेजेंटेशन का निर्माण किया था जिसमें वर्तमान टैक्स सिस्टम को खत्म करके बैंक की प्रत्येक लेन-देन पर 2 प्रतिशत कर लगाने का सुझाव दिया, साथ ही इंपोर्ट ड्यूटी पहले के समान ही रखने का सुझाव दिया। अर्थक्रांति ने ऐसे समय में यह प्रपोजल सरकार के सामने रखा है जब सरकार पिछले काफी समय से संसद में गुड एंड सर्विस टैक्स बिल को पास कराने का प्रयास कर रही है।

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NAIROBI: Recently, my attention was drawn through a WhatsApp group (to a novel idea called the Artharanti Proposal. Apparently one of the key members of this organisation was given nine minutes with India’s Prime Minister to put forward the proposal and emerged two hours later!

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The NDA government led by Prime Minister Narendra Modi was expected to radically change the tax system. A scheme was mooted by ArthKranti of abolishing all central and state taxes and replacing them with a simple 2 per cent banking transaction tax, which was expected to yield as much or more, than the current complex system. Presentations about this were made to important politicians. Responses from the BJP’s Big Three were: Modi (“The present taxation system is a burden on the common man. There is a need to introduce a new system”), Nitin Gadkari (“Those 3.5 lakh people (tax officials) will not be required anymore”), party president Rajnath Singh (“Why should we pay income tax?”). There was excitement and hope in the air.

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लंबे अर्से बाद उस दिन अतुल देशमुख से मुलाकात हुई। नागपुर के रहने वाले अतुल पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं। उनके साथ औरंगाबाद के अनिल बोकिल भी थे। अनिल से मेरी यह पहली मुलाकात थी। पता चला दोनों बाबा रामदेव से मिलने दिल्ली आए हैं (जो उन दिनों रामलीला मैदान में डटे हुए थे)। बाबा से मिलने की कोई खास वजह?

आजकल हम हर उस शख्स से मिल रहे हैं जो हमारी अर्थ क्रांति के प्रस्तावों से सहमत हो सकता है और उसे आगे बढ़ाने में मददगार हो सकता है। जवाब अतुल ने दिया, लेकिन अनिल बोकिल भी उसमें शामिल थे।

अब यह अर्थक्रांति क्या बला है? अब तक तरह-तरह की क्रांतियों के नाम सुन-सुनकर कान पक चुके हैं। टीम अन्ना भी अनशन के ताजा दौर को जारी नहीं रख सकी अनशन समाप्त करने के लिए क्रांति की घोषणाओं की ही आड़ ली। बाबा रामदेव भी कोई न कोई क्रांति ही करने वाले हैं। अब आप यह नई अर्थ क्रांति लेकर आए हैं। क्या है इसमें और क्यों सुनूं मैं?

आप तो इसलिए सुनेंगे क्योंकि देश और समाज की जो मौजूदा दशा और दिशा है उससे आप असंतुष्ट हैं। दूसरी वजह यह है कि जितनी भी क्रांतियों की बात आपने की, उनमें से कोई भी ऐसी नहीं है जो आपको संतुष्ट कर पाई हो। मैं आपसे पूछूं कि जन लोकपाल बिल से करप्शन मिट जाएगा तो आप किंतु-परंतु पर उतर आते हैं। बाबा रामदेव बाहर से सारी ब्लैकमनी ले भी आएं तो क्या उसके बाद ब्लैकमनी बननी बंद हो जाएगी? आपके पास जवाब नहीं है। इसलिए आपको हमारी बात धैर्य से सुननी चाहिए।

अजीब जबर्दस्ती है।

मुस्कुराते हुए बोले अतुल, जबर्दस्ती नहीं है। हम आपसे यह नहीं कह रहे कि आप हमारी बातें मान ही लो, पर सुनने का केस तो बनता है। अगर सुने बगैर हमारी बातें खारिज करना आपको ठीक लगता हो तो फिर..

अब मैंने हथियार डालते हुए कहा, प्रभो, सुनाइए अपनी बात.. मैं सरेंडर करता हूं।

इसके बाद के करीब एक घंटे अतुल और अनिल बोलते रहे.. मुझ पर उन बातों का क्या असर हुआ और मैं उन बातों से कितना सहमत-असहमत हूं, यह बाद में। पहले उनकी बातें, जो मैं सहमत हूं, मेरे सुनने लायक थीं और आपके पढऩे लायक हैं।

अर्थक्रांति की यह अवधारणा मूलत: अनिल बोकिल की है। अतुल उन चंद लोगों में हैं जिन्होंने सुनने, समझने के बाद इसे आगे बढ़ाने का काम अपने हाथ में लिया है। इनके मुताबिक बस पांच कदम हैं। अगर वे पूरी दृढ़ता से उठा लिए जाएं तो देखते-देखते हमारे देश और समाज को विकास ही नहीं, चेतना के भी नए धरातल पर पहुंचा सकते हैं। वहां हम, हमारे आसपास के लोग, उनकी सोच, उनकी चुनौतियां, उनकी उपलब्धियां, उनके मुद्दे सब इस कदर भिन्न होंगे कि तब यह कल्पना करना भी मुश्किल होगा कि वह हम ही हैं जो कुछ समय पहले तक करप्शन, क्राइम और ब्लैकमनी जैसी आसान बीमारियों को लाइलाज मानते थे।